Friday, August 22, 2008

रेगीस्तान


इतना दूर भी न भाग मुसाफ़िर,
ओस की तलाश में,
कि प्यास ही मार डाले तुझे,
भटकते हुए रेगिस्तान में,
निकाल खंजर और कर वार,
निकाल दहकते हुए रक्त को शरीर से,
लगा ले चार घूँट जीवन धारा के।


जब जल मिलेगा तब मिलेगा ऐ राहगीर,
ना कर इंतज़ार, नर्क सी इस दुपहरी में,
डगर डगर है नगर बहुत,
बावडी और गांव भी जो खंडहर बन चुके,
मिलेंगे आगे नर-कंकाल भी रेत के टिब्बों पर ,
कहीं तू सो न जाए उनके साथ हमेशा के लिए,
जीवनधारा की इस मृगतृष्णा में।