छन्न से आवाज़ आयी,
बिखर गया शीशा फर्श पर,
सामने एक चेहरा था मुझे चिढाता हुआ
आईने में बना हुआ प्रतिबिम्ब मेरा,
जैसे मुझे पर ही हस्ता है।
सहा जाये ना अब मुझसे
ये जग हंसायी का मंज़र
हर कण लहूलुहान कर जाए मेरे कदमो को
बेध जाए दिल के परदे को हज़ार बाण।
छलनी मन को लिए फिरता मैं दर बदर
मिले ना फिर भी सुकून जहाँ में
बदरा छाये आसमा पर
फिर भी लब सूख गए मेरे,
झरनों के इस मौसम में।
रेगिस्तान की तपती रेत सी जिन्दगी
छाया का दूर दूर तक नमोनिशां नही,
कोई आसरा, कोई मंज़िल नहीं,
ना बाकी है कोई अल्फाज़,
दबी है इन रेत के टिब्बो में मेरी ख्वाहिशे
दफ़न इसके गर्भ में कुछ सपने,
और, मेरी परछायी।
रूह मेरी खानाबदोश अब,
इस शहर, कभी उस शहर,
सदियों से मिला नही एक मकान,
जो कहे कि आ मित्र,
तेरा नया बसेरा है यहीं।
अफ़सोस ना कर फिर भी ऐ दिल
इन अनगिनत दरवाजो के पीछे तुम छुपी हो मेरी माँ,
खोल दो अपना आँचल,
समा लो मुझे आज अपने अंक में।
थक गया हूँ मैं,
अपनी नन्ही थपकियों से मुझे सहला दो,
नहला दो मुझे ममता से
सींच दो मेरे प्यासे मन को अपने दुलार से,
आज आयी है मेरे घर,
सावन की घटा जन्मों के बाद,
भीग कर सरोबर कर दो,
जाने दो मुझे अब,
बहुत भटक लिया मैं नगर-नगर।
अब आराम से लिटा कर,
फिर से सुला दो छुटपन सा,
नींद ना आये सदियों से माँ,
आज फिर वही लोरी सुना दे।
कर अपने लाल को हँसकर कर विदा
अपने पल्डे पर सिर रखकर सपने फिर से सजा दे,
मुस्कुरा दे माँ अब,
फिर से वही लोरी सुना दे।